कफ़न – सारांश
प्रेमचंद की कहानी कफ़न एक गहरी सामाजिक विडम्बना और गरीबी की मार्मिक तस्वीर प्रस्तुत करती है।
कहानी के केंद्र में दो पात्र हैं – घीसू और माधव। ये दोनों बाप-बेटे हैं और जात से चमार, पर आलस्य और निकम्मेपन के कारण समाज में बदनाम। मेहनत-मजदूरी से जी चुराना, दूसरों से भीख माँगकर या उधार लेकर जीवन काटना इनकी आदत है।
माधव की पत्नी बुधिया प्रसव पीड़ा में तड़प रही होती है, लेकिन बाप-बेटे उसके लिए दवा या दाई बुलाने की बजाय झोंपड़ी के बाहर आग तापते और आलू सेंककर खाते रहते हैं। उन्हें न तो पत्नी की पीड़ा की चिंता है और न ही उसकी मदद का विचार।
आखिरकार बुधिया प्रसव वेदना में दम तोड़ देती है। अब उसकी लाश को दफनाने के लिए कफ़न चाहिए। गाँव वाले सहानुभूति दिखाकर कुछ पैसे इकट्ठा करते हैं और उन्हें सौंप देते हैं।
लेकिन घीसू और माधव उस पैसे से कफ़न खरीदने के बजाय शराब और पकवान खाकर रातभर मौज-मस्ती करते हैं। वे सोचते हैं कि "औरत तो मर ही गई, कफ़न से क्या लाभ?" — इस प्रकार उनके लिए मृत्यु भी केवल पेट और लालच की पूर्ति का साधन बन जाती है।
मुख्य संदेश
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कहानी गरीबी और अभाव की पृष्ठभूमि में आलस्य, निकम्मेपन और संवेदनहीनता की पराकाष्ठा को उजागर करती है।
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यह समाज की करुण सच्चाई बताती है कि कैसे आर्थिक तंगी इंसान को कठोर, स्वार्थी और पतित बना देती है।
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प्रेमचंद ने यहाँ यथार्थवाद और व्यंग्य का प्रयोग करते हुए पाठकों को गहन सोचने पर मजबूर किया है।
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